केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में इसके सभी अंशों की धुन बजाने और पाठ को अनिवार्य किए जाने संबंधी अधिसूचना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मौलाना अरशद मदनी ने इसे अत्यंत पक्षपातपूर्ण, दुखद और नागरिकों पर जबरन थोपा गया निर्णय करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह आदेश संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है और देश के अल्पसंख्यकों से उनके बुनियादी अधिकार छीनने की साज़िश है।

मौलाना मदनी ने कहा कि यह अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान सत्ता को न तो देश की तरक़्क़ी से कोई सरोकार है और न ही आम जनता की असली समस्याओं से। उनका हर फैसला चुनावी फ़ायदे-नुक़सान को ध्यान में रखकर लिया जाता है और इसी राजनीति के तहत समाज में बेवजह विवाद पैदा किए जाते हैं। वंदे मातरम् को लेकर जारी की गई अधिसूचना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है।
उन्होंने याद दिलाया कि वंदे मातरम् का विवाद कोई नया नहीं है। दिसंबर 2025 में संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान भी जमीयत उलमा-ए-हिंद ने अपना रुख साफ़ कर दिया था। उन्होंने कहा कि किसी के वंदे मातरम् गाने या इसकी धुन बजाने पर मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मुसलमान इस गीत का पाठ इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि इस्लाम केवल एक अल्लाह की इबादत की इजाज़त देता है और उसमें किसी अन्य को शामिल करने की गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् की विषयवस्तु में ऐसे अंश हैं जो शिर्क से संबंधित मान्यताओं से जुड़े हुए हैं और एक अंतरे में देश को दुर्गा माता से उपमा देकर उसकी उपासना से संबंधित शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो इस्लामी अक़ीदे से मेल नहीं खाता।
मौलाना मदनी ने कहा कि हर धर्म के अपने उसूल और अहकाम होते हैं और संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपने धर्म पर अमल करने की पूरी आज़ादी दी गई है। ऐसे में किसी भी नागरिक या समुदाय को किसी विशेष विचारधारा, प्रतीक या पाठ को अपनाने के लिए मजबूर करना संविधान का खुला उल्लंघन है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में साफ़ कहा है कि किसी नागरिक को राष्ट्रगान या किसी ऐसे गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो उसके धार्मिक विश्वास के विरुद्ध हो।
उन्होंने कहा कि देश से मोहब्बत और देश की पूजा दो अलग बातें हैं। मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों को इतिहास के पन्ने पलटकर देखने चाहिए। आज़ादी की जंग में मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद के बुज़ुर्गों की बेमिसाल कुर्बानियाँ किसी से छुपी नहीं हैं। देश के बँटवारे के विरोध में जमीयत की भूमिका और आज़ादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए की गई जद्दोजहद इतिहास का अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि देशभक्ति नारों से नहीं बल्कि दिल की निष्ठा और अमल से साबित होती है।
मौलाना मदनी ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि 26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में यह सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए, क्योंकि शेष पंक्तियाँ एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं से टकराती हैं। इसके बाद 19 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने भी यही निर्णय लिया था। संसद में हुई लंबी बहस के दौरान भी अधिकांश सदस्यों ने इसी बात पर सहमति जताई थी, लेकिन अब पूरे गीत को एक आदेश के ज़रिये नागरिकों पर थोपने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने अंत में कहा कि यह फैसला देश को जोड़ने वाला नहीं बल्कि बाँटने वाली राजनीति का हिस्सा है। हर हाल में सत्ता में बने रहने की यह ज़िद देश की शांति, एकता और उस संविधान को नुकसान पहुँचाने वाली है जिस पर भारत के महान लोकतंत्र की बुनियाद टिकी हुई है।

