Friday, May 29, 2026
No menu items!
Homeअंतरराष्ट्रीयउजाले अपनी यादों के…” कहने वाला शायर अब यादों में रह गया...

उजाले अपनी यादों के…” कहने वाला शायर अब यादों में रह गया पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र साहब का 91 साल की उम्र में निधन

उर्दू शायरी की दुनिया से एक बेहद दर्दनाक खबर सामने आई है। मोहब्बत, रिश्तों और इंसानी एहसासों को बेहद आसान और खूबसूरत लफ्ज़ों में बयां करने वाले मशहूर शायर Bashir Badr अब इस दुनिया में नहीं रहे।
28 मई 2026 को भोपाल में 91 वर्ष की उम्र में उनका इंतकाल हो गया। वे पिछले लगभग 14 वर्षों से डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझ रहे थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे।

उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, शायरी और मुशायरों की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई।
सोशल मीडिया पर लाखों लोग उनके अशआर साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
जन्म से लेकर आख़िरी सफर तक
जन्म
पूरा नाम: डॉ. सैयद मोहम्मद बशीर
मशहूर नाम: बशीर बद्र
जन्म: 15 फरवरी 1935
जन्म स्थान: उत्तर प्रदेश (अयोध्या/कानपुर से जुड़ा परिवार)
शिक्षा और करियर
बशीर बद्र साहब ने उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा हासिल की और बाद में शिक्षण कार्य से जुड़ गए।
उन्होंने Aligarh Muslim University तथा मेरठ कॉलेज में उर्दू के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
वे सिर्फ एक शिक्षक नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को उर्दू से जोड़ने वाले एक बड़े अदबी चेहरा थे।

उर्दू ग़ज़ल को आम आदमी तक पहुंचाने वाले शायर
बशीर बद्र साहब की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने कठिन अरबी-फारसी शब्दों वाली पारंपरिक उर्दू शायरी को बेहद आसान और दिल छू लेने वाली भाषा में पेश किया।
उनकी ग़ज़लें कॉलेजों, मुशायरों, किताबों, सोशल मीडिया पोस्टों और यहां तक कि ट्रकों के पीछे लिखी लाइनों तक में मशहूर हुईं।
उन्होंने मोहब्बत को सिर्फ इश्क़ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इंसानियत, रिश्तों, दूरी, दर्द और समाज की सच्चाइयों को भी अपनी शायरी में जगह दी।
मेरठ दंगों का दर्द, जिसने उनकी शायरी को और गहरा कर दिया
साल 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया था।
उस आग में उनकी कई अनमोल किताबें और अप्रकाशित ग़ज़लें भी खाक हो गईं।
इसके बाद वे भोपाल जाकर बस गए।
लेकिन इतने बड़े दर्द के बावजूद उन्होंने नफ़रत नहीं लिखी।
उन्होंने मोहब्बत और इंसानियत का पैगाम देना जारी रखा।
तभी तो उनका यह शेर आज भी लोगों के दिलों को छू जाता है —
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में”

सम्मान और उपलब्धियां
Bashir Badr को साहित्य की दुनिया में उनके शानदार योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले।
प्रमुख सम्मान:
पद्मश्री पुरस्कार — 1999
साहित्य अकादमी पुरस्कार — ‘आस’ के लिए
देश-विदेश के सैकड़ों मुशायरों में विशेष सम्मान
उन्होंने 500 से अधिक मुशायरों में हिस्सा लिया और अपनी आवाज़ से लाखों लोगों को मोहब्बत का पैगाम दिया।
❤️ वो अशआर जो हमेशा जिंदा रहेंगे

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए”

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों”

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो”

“मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी”

“मैं हूँ ट्रक पर लिखा एक शेर
तू मुझको गुज़रने दे”
जावेद अख्तर ने क्या कहा?
मशहूर शायर और गीतकार Javed Akhtar ने बशीर बद्र साहब के निधन पर दुख जताते हुए कहा —
“आज हमारी ज़बान उर्दू थोड़ी और ग़रीब हो गई।
बशीर बद्र जैसा शायर सदियों में पैदा होता है।”

️ अलविदा बशीर बद्र साहब…
15 फरवरी 1935 को जन्मा एक शायर
28 मई 2026 को इस दुनिया से चला गया…
लेकिन उसकी लिखी मोहब्बत आज भी जिंदा है।
उसके अशआर आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
और जब तक उर्दू ज़िंदा है, बशीर बद्र साहब भी ज़िंदा रहेंगे।
“शायर मरते नहीं…
वो अपने अल्फ़ाज़ों में सांस लेते रहते हैं…” ️

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

अभी अभी

लोकप्रिय खबर