डॉ. शकील अहमद द्वारा साझा विचारों पर आधारित विशेष लेख
ईद-उल-अज़हा, जिसे आम बोलचाल में बक़रीद भी कहा जाता है, इस्लाम धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है। यह त्योहार त्याग, समर्पण, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देता है। भारत के वरिष्ठ राजनेता एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. शकील अहमद ने अपने फेसबुक वॉल पर ईद-उल-अज़हा के धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व को विस्तार से साझा किया है।
उन्होंने लिखा कि ईद-अल-अज़हा इस्लामिक कैलेंडर के बारहवें और अंतिम महीने ज़िल-हिज्ज की 10वीं तारीख़ को मनाई जाती है। इसी समय दुनिया भर से लाखों मुसलमान सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का और मदीना पहुंचकर हज की धार्मिक प्रक्रिया पूरी करते हैं। इस्लाम में हज हर उस मुसलमान पर फ़र्ज़ माना गया है, जो शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हो।
डॉ. शकील अहमद ने पुराने समय के हज सफर का उल्लेख करते हुए बताया कि पहले हवाई यात्रा की सुविधा बहुत कम थी। अधिकतर लोग समुद्री रास्तों से लंबी और कठिन यात्रा करके मक्का पहुंचते थे। समुद्री यात्रा के दौरान लोगों को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। कई बार यात्रियों की मृत्यु तक हो जाती थी। उस दौर में संचार व्यवस्था भी सीमित थी, इसलिए हज पर गए लोगों की खबर महीनों तक नहीं मिल पाती थी।
उन्होंने कहा कि आज तकनीक और संचार के विकास ने दुनिया को काफी बदल दिया है। अब हज पर गए लोग अपने परिवारों से वीडियो कॉल के माध्यम से लगातार जुड़े रहते हैं। डॉ. शकील अहमद ने अपने निजी अनुभव साझा करते हुए बताया कि इस वर्ष उनके छोटे भाई, बहनें और बहनोई हज पर गए हैं और उनसे रोज़ वीडियो कॉल पर बातचीत हो रही है।
उन्होंने हज और उमरा के बीच अंतर को भी सरल शब्दों में समझाया। उनके अनुसार हज वर्ष के एक निश्चित समय में किया जाने वाला धार्मिक कर्तव्य है, जबकि उमरा वर्ष के किसी भी समय किया जा सकता है।
ईद-उल-अज़हा का संबंध हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की महान क़ुर्बानी से जुड़ा हुआ है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हज़रत इब्राहिम अल्लाह के आदेश पर अपनी सबसे प्रिय चीज़ की क़ुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। यह घटना त्याग, विश्वास और समर्पण की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है। इसी परंपरा की याद में मुसलमान ईद-अल-अज़हा पर क़ुर्बानी अदा करते हैं।
डॉ. शकील अहमद ने अपने लेख में यह भी बताया कि यहूदी, ईसाई और मुस्लिम — तीनों धर्म हज़रत इब्राहिम से जुड़े होने के कारण “इब्राहमिक धर्म” कहलाते हैं। इन धर्मों की शुरुआत अरब क्षेत्र से हुई और इनकी धार्मिक परंपराओं में कई समानताएं देखने को मिलती हैं।
उन्होंने समाज में फैली कुछ धारणाओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार भारत में अक्सर यह कहा जाता है कि मुस्लिम समाज सबसे अधिक मांसाहारी है, जबकि विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी मांसाहार करती है और उसमें गैर-मुस्लिम समाज की संख्या भी बड़ी है।
डॉ. शकील अहमद ने लिखा कि ईद का अर्थ खुशियां बांटना होता है। इस्लाम में मुख्य रूप से तीन ईद मनाई जाती हैं —
ईद-उल-फ़ित्र — पवित्र रमज़ान के एक महीने के रोज़ों के बाद मनाई जाती है।
ईद-उल-अज़हा (बक़रीद) — ज़िल-हिज्ज की 10वीं तारीख़ को मनाई जाती है और इसी दौरान क़ुर्बानी दी जाती है।
ईद मिलादुन्नबी — हज़रत मोहम्मद साहब (PBUH) के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि ईद केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, भाईचारा, सहयोग और इंसानियत को मजबूत करने का अवसर है। ईद-उल-अज़हा हमें त्याग, समर्पण और मानवता की भावना के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
अंत में डॉ. शकील अहमद ने सभी देशवासियों को ईद-अल-अज़हा की हार्दिक मुबारकबाद देते हुए शांति, सद्भाव और आपसी भाईचारे की कामना की।
“ईद का असली संदेश प्रेम, त्याग और इंसानियत है।”
