Saturday, September 12, 2026
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दरभंगा में मुख्य पोस्टमास्टर जनरल मुज़फ़्फ़र अब्दाली के सम्मान में भव्य साहित्यिक संध्या, साहित्य और संस्कृति का दिखा अद्भुत संगम

दरभंगा। बिहार के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल एवं प्रख्यात उर्दू शायर मुज़फ़्फ़रुद्दीन अब्दाली (मुज़फ़्फ़र अब्दाली) के सम्मान में अल-मंसूर एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट, दरभंगा की ओर से हकीम दमड़ी मंज़िल स्थित डॉ. आफ़ताब हुसैन कॉम्प्लेक्स, सुभाष चौक में एक गरिमामयी साहित्यिक संध्या का आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल सम्मान समारोह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक मूल्यों के समन्वय का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकारों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और उर्दू प्रेमियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार सुल्तान शम्स ने की, जबकि संचालन प्रसिद्ध लेखक डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद ने किया। समारोह के संरक्षक डॉ. सैयद ज़फ़र आफ़ताब हुसैन थे। मध्य प्रदेश के जबलपुर से आए प्रसिद्ध शायर मन्नान फ़राज़ विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

पारंपरिक सम्मान से हुआ स्वागत
समारोह की शुरुआत मिथिला की पारंपरिक आतिथ्य परंपरा के अनुरूप हुई। ट्रस्ट के सचिव डॉ. मंसूर खुश्तर, संरक्षक डॉ. सैयद ज़फ़र आफ़ताब हुसैन, रफ़ी नश्तर, हबीब हुसैन, सैयद अरशद मिन्हाज, डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद, डॉ. एहसान आलम और मंज़र सुलेमान ने सामूहिक रूप से मुज़फ़्फ़र अब्दाली को चादर ओढ़ाकर सम्मानित किया।

इस अवसर पर ट्रस्ट की ओर से उनकी प्रशासनिक, साहित्यिक और सामाजिक सेवाओं के सम्मान में एक विशेष स्मृति-पत्र भी भेंट किया गया, जिसका वाचन डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद ने किया। स्मृति-पत्र में उनकी ईमानदार प्रशासनिक कार्यशैली, उर्दू साहित्य में योगदान और भाषा-संस्कृति के प्रति उनके समर्पण को रेखांकित किया गया।

“प्रशासन और साहित्य का प्रेरणादायक संगम हैं मुज़फ़्फ़र अब्दाली”
स्वागत भाषण में ट्रस्ट के सचिव डॉ. मंसूर खुश्तर ने कहा कि मुज़फ़्फ़र अब्दाली उन विरले व्यक्तित्वों में शामिल हैं जिन्होंने उच्च प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ साहित्य से अपना रिश्ता कभी कमजोर नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि उनका जीवन युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है और यह संदेश देता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो व्यस्त जीवन में भी अध्ययन और साहित्य-साधना के लिए समय निकाला जा सकता है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1971 में पटना में जन्मे मुज़फ़्फ़र अब्दाली वर्तमान में बिहार के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल के पद पर कार्यरत हैं। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने उर्दू कविता की दुनिया में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी शायरी में मानवीय संवेदनाएँ, सामाजिक चेतना और जीवन के विविध अनुभव सहज रूप से अभिव्यक्त होते हैं।

वक्ताओं ने की साहित्यिक योगदान की सराहना
समारोह के दूसरे चरण में विभिन्न साहित्यकारों और विद्वानों ने अपने विचार रखे।
प्रसिद्ध शायर अनवर कमाल ने कहा कि मुज़फ़्फ़र अब्दाली की शायरी जीवन के वास्तविक अनुभवों की सशक्त अभिव्यक्ति है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में भावनाओं की सच्चाई और भाषा की सादगी पाठकों को गहराई से प्रभावित करती है।

डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद ने कहा कि साहित्य केवल लेखन की कला नहीं सिखाता, बल्कि इंसान को बेहतर मनुष्य भी बनाता है और यह गुण मुज़फ़्फ़र अब्दाली के व्यक्तित्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
विशेष अतिथि मन्नान फ़राज़ ने कहा कि बिहार की धरती सदैव ज्ञान और साहित्य की उर्वर भूमि रही है तथा मुज़फ़्फ़र अब्दाली उसी समृद्ध परंपरा के सशक्त प्रतिनिधि हैं।

डॉ. एहसान आलम ने उन्हें गंभीर साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में शब्दों का सौंदर्य और विचारों की गहराई दोनों मौजूद हैं।
वहीं डॉ. मंज़र सलमान, अरशद सलफ़ी और डॉ. अयूब राईन ने कहा कि मुज़फ़्फ़र अब्दाली ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेम, सहिष्णुता, मानवीय मूल्यों और सकारात्मक सोच को मजबूत स्वर दिया हैl

“नौकरी मेरा पेशा, साहित्य मेरी आत्मा है” – मुज़फ़्फ़र अब्दाली
मुख्य अतिथि मुज़फ़्फ़र अब्दाली ने सम्मान के लिए अल-मंसूर एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि दरभंगा हमेशा से ज्ञान, साहित्य और संस्कृति की उर्वर भूमि रही है। उन्होंने कहा कि यहाँ आकर उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वे अपने ही साहित्यिक परिवार के बीच हों।

उन्होंने कहा कि मुख्य पोस्टमास्टर जनरल के रूप में पूरे बिहार के डाक तंत्र की जिम्मेदारी बेहद व्यापक और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने साहित्य से अपना रिश्ता कभी नहीं टूटने दिया।
उन्होंने कहा, “नौकरी मनुष्य का पेशा हो सकती है, लेकिन साहित्य उसकी आत्मा होता है। इसलिए व्यस्ततम दिनचर्या के बीच भी मैं लेखन के लिए समय अवश्य निकालता हूँ। यात्रा के दौरान, कार्यालय के बाद या रात की नीरवता में जब भी अवसर मिलता है, मैं अपने अनुभवों और भावनाओं को शब्दों में ढालने का प्रयास करता हूँ।”
उन्होंने बताया कि उनकी शायरी किसी पूर्व योजना का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, यात्राओं, लोगों से मुलाकातों और एकांत के क्षणों से स्वतः जन्म लेती है।

साहित्यिक चेतना को मिला नया आयाम
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने आयोजन को अत्यंत सफल, प्रेरणादायक और यादगार बताते हुए कहा कि ऐसे साहित्यिक आयोजन समाज में रचनात्मक सोच को मजबूत करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को साहित्य और संस्कृति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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