नई दिल्ली: दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में है। 1 नवंबर को राहुल गांधी की अगुवाई में INDIA गठबंधन की महारैली प्रस्तावित है। इस रैली को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रामलीला मैदान का इतिहास सिर्फ राजनीतिक सभाओं तक सीमित नहीं है? यह मैदान कई बड़े आंदोलनों, सरकार विरोधी प्रदर्शनों और देश की राजनीति में आए बदलावों का गवाह रहा है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान तक, रामलीला मैदान ने कई बार राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब INDIA गठबंधन की प्रस्तावित महारैली के कारण यह ऐतिहासिक मैदान एक बार फिर चर्चा में है।
1975 का जेपी आंदोलन: जब गूंजा सत्ता के खिलाफ विरोध
रामलीला मैदान के इतिहास में 25 जून 1975 की सभा का खास महत्व है। उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और उनके निर्वाचन को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया था।
जयप्रकाश नारायण यानी जेपी के नेतृत्व में आयोजित सभा में बड़ी संख्या में लोग जुटे। जेपी ने सरकार के खिलाफ आंदोलन को तेज करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का आह्वान किया।
इसके कुछ ही घंटों बाद देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए।
1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद जेपी ने फिर जनता से लोकतंत्र के पक्ष में मतदान करने की अपील की। इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने जीत हासिल की और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
2011 में अन्ना हजारे का आंदोलन, देशभर में हुई चर्चा
भ्रष्टाचार के खिलाफ 2011 में शुरू हुआ अन्ना हजारे का आंदोलन भी रामलीला मैदान के इतिहास का अहम हिस्सा है। प्रभावी लोकपाल कानून की मांग को लेकर अन्ना हजारे ने यहां 12 दिनों तक अनशन किया।
इस आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। भ्रष्टाचार के खिलाफ नारेबाजी और देशभर में हुए प्रदर्शनों ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। तत्कालीन यूपीए सरकार पर लोकपाल कानून को लेकर दबाव बढ़ा।
इस आंदोलन से जुड़े कई लोगों ने बाद में आम आदमी पार्टी के गठन में भूमिका निभाई। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी ने 2013 में दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।
बाबा रामदेव का आंदोलन और आधी रात की पुलिस कार्रवाई
जून 2011 में योग गुरु बाबा रामदेव ने भी काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला मैदान में आंदोलन शुरू किया था।
4 और 5 जून की दरम्यानी रात पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए कार्रवाई की। इस दौरान मैदान में अफरातफरी मच गई और बाबा रामदेव को हिरासत में ले लिया गया। इस घटना ने देशभर में राजनीतिक बहस छेड़ दी।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कश्मीर सत्याग्रह
रामलीला मैदान का राजनीतिक इतिहास इससे भी पुराना है। भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में कश्मीर से जुड़ी परमिट व्यवस्था और विशेष संवैधानिक प्रावधानों के विरोध में सत्याग्रह किया था।
मुखर्जी बाद में बिना परमिट जम्मू-कश्मीर पहुंचे, जहां हिरासत के दौरान 1953 में उनकी मृत्यु हो गई। कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर उनका आंदोलन भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं में गिना जाता है।
किसान, मजदूर और कर्मचारी भी उठा चुके हैं आवाज
पिछले कुछ वर्षों में रामलीला मैदान पर किसानों, मजदूरों और सरकारी कर्मचारियों ने भी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किए हैं।
किसान-मजदूर आंदोलन: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कर्ज माफी और बेहतर मजदूरी जैसी मांगों को लेकर सभाएं हुईं।
पुरानी पेंशन योजना: सरकारी कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने की मांग उठाई।
लोकतंत्र बचाओ रैली: मार्च 2024 में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के खिलाफ रामलीला मैदान में रैली आयोजित की।
नागरिकता कानून पर विरोध: CAA के खिलाफ आंदोलनों के दौरान भी दिल्ली में प्रदर्शन और हिरासत की घटनाएं सामने आईं।
जंतर-मंतर की जगह रामलीला मैदान क्यों है चर्चा में?
दिल्ली में जंतर-मंतर लंबे समय से विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। हालांकि, अक्टूबर 2026 में प्रदर्शन स्थलों को लेकर हुए बदलावों के बाद रामलीला मैदान की भूमिका पर फिर चर्चा हो रही है।
संसद और सत्ता के प्रमुख केंद्रों के अपेक्षाकृत करीब होने के कारण यह मैदान बड़े राजनीतिक आयोजनों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां होने वाली रैलियों का संदेश राजधानी से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचता रहा है।
1 नवंबर की महारैली पर टिकी नजरें
अब 1 नवंबर को प्रस्तावित INDIA गठबंधन की महारैली को लेकर राजनीतिक नजरें रामलीला मैदान पर टिकी हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में होने वाले इस आयोजन में विपक्ष किन मुद्दों को प्रमुखता देता है और जनता के सामने क्या संदेश रखता है, यह देखने वाली बात होगी।
जेपी आंदोलन, अन्ना हजारे के अनशन और विपक्ष की पिछली रैलियों के इतिहास के बीच इस आयोजन को भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इसका वास्तविक राजनीतिक असर रैली में उठाए जाने वाले मुद्दों, भागीदारी और आगे की राजनीतिक गतिविधियों से ही स्पष्ट होगा।
रामलीला मैदान का इतिहास बताता है कि यह जगह केवल जनसभाओं का स्थल नहीं, बल्कि देश में असहमति, जन आंदोलनों और राजनीतिक बहसों का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी रही है। अब देखना होगा कि 1 नवंबर की महारैली इस ऐतिहासिक सिलसिले में क्या नया अध्याय जोड़ती है।
