Wednesday, September 2, 2026
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नैय्यर आज़म: सियासत में एक ऐसा नाम, जिसकी कमी आज भी महसूस होती है — नजरे आलम

मधुबनी। कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन उनकी यादें और उनके द्वारा बनाए गए रिश्ते लंबे समय तक लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं। मधुबनी जिले के पंडौल विधानसभा क्षेत्र के सकरी दरबार टोला से ताल्लुक रखने वाले पूर्व विधायक नैय्यर आज़म भी ऐसे ही जननेताओं में शुमार किए जाते हैं, जिनकी सादगी, शराफत, मिलनसारिता और आम लोगों से जुड़ाव को आज भी याद किया जाता हैl

नजरे आलम के मुताबिक, नैय्यर आज़म सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि जनता के बीच रहने वाले ऐसे जनप्रतिनिधि थे, जिनके लिए इंसान और इंसानियत को सबसे अधिक महत्व हासिल था। उनके राजनीतिक जीवन में संघर्ष, धैर्य और जनता के साथ लगातार जुड़े रहने की कहानी दिखाई देती है।

लगातार हार के बावजूद नहीं छोड़ा संघर्ष
नैय्यर आज़म ने अपनी राजनीतिक यात्रा संघर्ष के साथ शुरू की। वर्ष 1985 में जनता पार्टी के टिकट पर उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद 1990 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे। इस चुनाव में भी उन्हें बेहद कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा।

लगातार दो चुनावों में हार के बावजूद नैय्यर आज़म ने राजनीतिक संघर्ष नहीं छोड़ा। वह क्षेत्र में सक्रिय रहे और गरीबों, जरूरतमंदों तथा आम लोगों के मुद्दों को उठाते रहे।
आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और 1995 में जनता दल के टिकट पर उन्होंने पंडौल विधानसभा क्षेत्र से पहली बार जीत दर्ज की।

इसके बाद वर्ष 2000 में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के टिकट पर दूसरी बार और फरवरी 2005 में तीसरी बार चुनाव जीतकर उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। इस तरह नैय्यर आज़म पंडौल विधानसभा क्षेत्र से कुल तीन बार विधायक रहे। उनकी चुनावी सफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण यह माना जाता है कि उन्होंने लंबे समय तक क्षेत्र की जनता के बीच अपनी जगह बनाए रखी।

जनता का भरोसा थी उनकी सबसे बड़ी ताकत
नैय्यर आज़म की पहचान केवल उनके राजनीतिक पद से नहीं थी। उनके समर्थकों और उन्हें करीब से जानने वालों के अनुसार, उनका सबसे बड़ा गुण लोगों से सहजता से मिलना और उनकी समस्याओं को सुनना था।

गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करना, लोगों के सुख-दुख में शामिल होना तथा शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में लोगों को आगे बढ़ने में सहयोग करना उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रहा।

कई लोग आज भी यह मानते हैं कि उनके जीवन में आगे बढ़ने में नैय्यर आज़म के सहयोग और मार्गदर्शन की भूमिका रही। यही किसी जनप्रतिनिधि की वास्तविक राजनीतिक पूंजी मानी जाती है।

परिवारवाद से अलग रही उनकी राजनीति
आज की राजनीति में परिवार और राजनीतिक विरासत का मुद्दा अक्सर चर्चा में रहता है। ऐसे दौर में नैय्यर आज़म की राजनीतिक शैली को उनके समर्थक अलग नजरिए से देखते हैं।

उनके परिवार में शिक्षित और योग्य सदस्य होने के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत को किसी एक रिश्तेदार या परिवार के सदस्य के नाम करने की कोशिश नहीं की। उनकी राजनीति में जनता के बीच काम और व्यक्तिगत संबंधों को अधिक महत्व दिया गया।

उनसे जुड़े लोगों का मानना है कि वह राजनीति को परिवार की संपत्ति के बजाय जनता की अमानत समझते थे।
हालांकि, उनके निधन के बाद उनके परिवार को वह राजनीतिक अवसर और प्रभाव नहीं मिल सका, जिसकी उम्मीद उनके समर्थकों को थी। समय के साथ परिवार और आम जनता के बीच वह राजनीतिक नजदीकी भी कमजोर होती गई, जो नैय्यर आज़म की मौजूदगी में दिखाई देती थी।

निधन के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
समय के साथ पंडौल विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक स्वरूप बदला और बाद में पंडौल विधानसभा क्षेत्र का विलय मधुबनी विधानसभा क्षेत्र में हो गया।
नैय्यर आज़म को भी अपने राजनीतिक जीवन के बाद के दौर में चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 2015 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार उन्हें सफलता नहीं मिली।

इसके बाद वह धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते गए। लंबे समय से अस्वस्थ रहने के कारण उनका काफी समय पटना में इलाज के दौरान बीता और जुलाई 2019 में पटना में उनका निधन हो गया।

उनके निधन की खबर से इलाके में शोक की लहर दौड़ गई थी। उस समय मधुबनी के विधायक समीर कुमार महासेठ ने भी उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए उन्हें समाजवादी विचारधारा की महत्वपूर्ण कड़ी बताया थाl

सियासी विरासत सिर्फ कुर्सी का नाम नहीं
नैय्यर आज़म की राजनीतिक यात्रा यह सवाल भी खड़ा करती है कि किसी नेता की वास्तविक विरासत आखिर क्या होती है?
क्या विरासत सिर्फ चुनाव जीतने, पद हासिल करने या परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे बढ़ाने का नाम है?
या फिर उन हजारों लोगों के दिलों में जगह बनाना ही किसी नेता की सबसे बड़ी विरासत है, जिनके सुख-दुख में वह वर्षों तक खड़ा रहा?

नैय्यर आज़म के राजनीतिक जीवन को देखने वाले लोगों के लिए उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी तीन चुनावी जीत से कहीं आगे थी। उनकी असली ताकत वह भरोसा था, जो उन्होंने आम लोगों के बीच बनाया।

आज के नेताओं के लिए भी एक संदेश
आज राजनीति में चुनावी रणनीति, संसाधन, संगठन और राजनीतिक परिवारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे समय में नैय्यर आज़म जैसे नेताओं का राजनीतिक सफर यह याद दिलाता है कि जनता के दिल में स्थायी जगह केवल पद या शक्ति से नहीं बनाई जा सकती।
इसके लिए वर्षों तक लोगों के बीच रहना, उनकी बात सुनना, जरूरत के समय उनके साथ खड़ा होना और व्यक्तिगत रिश्तों को सम्मान देना पड़ता है।

नैय्यर आज़म अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनसे जुड़े लोगों की यादों में उनकी मौजूदगी आज भी महसूस की जाती है।

उनकी सियासी विरासत कोई कुर्सी नहीं, बल्कि लोगों के साथ बनाए गए रिश्ते, मोहब्बत, इखलास और भरोसे की वह पूंजी है, जिसे समय भी पूरी तरह मिटा नहीं सका।

कुछ लोग चले जाते हैं मगर उनकी यादें नहीं जातीं,
कुछ किरदार मिट जाते हैं मगर उनकी मिसाल नहीं जाती।

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