पटना/मधुबनी।
बिहार में संस्कृत विद्यालयों और मदरसों की जांच के सरकारी आदेश के बाद शिक्षा जगत में बहस तेज हो गई है। इसी मुद्दे पर बिहार स्टेट मदरसा बोर्ड एसोसिएशन (MDO) के अध्यक्ष अब्दुल कुद्दूस ने कई अहम सवाल उठाते हुए मदरसा बोर्ड के कामकाज, चेयरमैन के बयानों और मदरसों के प्रति बनाए जा रहे माहौल पर खुलकर अपनी बात रखी।
अब्दुल कुद्दूस ने कहा कि बिहार स्टेट मदरसा एजुकेशन बोर्ड एक स्वायत्त संस्था है,
जिसे इस उद्देश्य से बनाया गया था कि राज्य भर के मदरसों की निगरानी हो, उनकी जरूरतों को पूरा किया जाए, बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज मदरसा बोर्ड से जुड़े कुछ लोगों के बयानों के कारण मदरसों को लेकर अनावश्यक विवाद खड़े किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा चेयरमैन लगातार यह बयान देते रहे हैं कि “कागज़ पर चल रहे मदरसों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कहीं कोई फर्जी या कागजी मदरसा संचालित हो रहा है तो बोर्ड के पास उसके खिलाफ कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। बार-बार सार्वजनिक मंचों से बयान देने के बजाय ऐसे संस्थानों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पूरे बिहार में संस्कृत विद्यालयों और मदरसों दोनों की जांच के आदेश जारी किए गए हैं,
लेकिन मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में केवल मदरसों को ही केंद्र में रखा जा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि जांच से किसी को कोई आपत्ति नहीं है। जांच होनी चाहिए, पारदर्शिता होनी चाहिए और यदि कहीं गड़बड़ी है तो उसे सामने भी आना चाहिए।
हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो का जिक्र करते हुए अब्दुल कुद्दूस ने कहा कि एक मदरसे के पास स्थित पोल्ट्री फार्म को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो वही मदरसा हो। उन्होंने कहा कि यदि किसी मदरसे की स्थिति दिखानी थी तो उसके कक्ष, छात्र, शिक्षक और शैक्षणिक गतिविधियां दिखाई जानी चाहिए थीं। केवल बगल में मौजूद किसी पोल्ट्री फार्म की तस्वीरें और वीडियो दिखाकर पूरे मदरसे को संदेह के घेरे में खड़ा करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि ऐसे वीडियो आम लोगों के बीच भ्रम पैदा करते हैं और इससे यह संदेश जाता है कि मदरसे को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को तथ्यों के आधार पर बात करनी चाहिए, न कि ऐसे दृश्य प्रस्तुत करने चाहिए जिनसे संस्थानों की छवि प्रभावित हो।
मदरसों के शिक्षकों और कर्मचारियों के पिछले तीन से चार महीनों से लंबित वेतन के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि फिलहाल इसे किसी साजिश या जांच अभियान से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार की वित्तीय प्रक्रियाओं और आवंटन संबंधी कारणों से भी भुगतान में देरी हो सकती है l
उन्होंने बताया कि केवल मदरसों में ही नहीं, बल्कि अन्य शैक्षणिक संस्थानों में भी भुगतान में विलंब की शिकायतें सामने आई हैं।
अब्दुल कुद्दूस ने कहा कि फिलहाल सरकार की नीयत पर सवाल उठाना उचित नहीं होगा, लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही आवंटन जारी कर शिक्षकों और कर्मचारियों के लंबित वेतन का भुगतान किया जाएगा।
अंत में उन्होंने कहा कि बिहार के मदरसे वर्षों से शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच, तथ्य और वास्तविक स्थिति को सामने लाना जरूरी है।
उन्होंने दोहराया कि “बिहार के मदरसे कागज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर चल रहे हैं और समाज को शिक्षित करने का काम कर रहे हैं।”
