मधुबनी | संत शिरोमणि नरहरी दास (गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु महाराज) की पुण्यतिथि मधुबनी में जेएन कॉलेज के समीप श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई गई। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संत नरहरी दास के जीवन, व्यक्तित्व और आध्यात्मिक योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भाजपा नेता एवं स्वर्णकार विचार मंच के राष्ट्रीय परिषद सदस्य स्वर्णिम गुप्ता ने बताया कि संत शिरोमणि नरहरी दास, जिन्हें नरहरि सोनार के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म 13वीं शताब्दी में पंढरपुर (वर्तमान महाराष्ट्र) में स्वर्णकार कुल में हुआ था। वे महान संत, कवि, शिवभक्त तथा स्वर्णकला में अत्यंत दक्ष थे।

उन्होंने प्राचीन मतों के अनुसार प्रचलित एक प्रसिद्ध घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि पंढरपुर स्थित भगवान विठोबा (भगवान विष्णु का एक रूप) के मंदिर में प्रतिमा के लिए कमरबंद निर्माण का कार्य एक जमींदार-व्यापारी ने नरहरि जी से करवाना चाहा। प्रारंभ में नरहरि जी ने यह कहते हुए असहमति जताई कि वे शिव के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना नहीं करते और विठोबा मंदिर नहीं जाते। किंतु जमींदार के आग्रह पर वे आंखों पर पट्टी बांधकर मंदिर के गर्भगृह में अकेले प्रवेश किए।
नरहरि जी ने प्रतिमा को स्पर्श किया तो उन्हें पांच सिर, दस भुजाएं, गले में सर्प आभूषण, बाघंबर वस्त्र और भस्म से ढके शरीर का अनुभव हुआ, जिससे उन्हें अपने आराध्य भगवान शिव का आभास हुआ। जब उन्होंने पट्टी हटाई तो सामने विठोबा की प्रतिमा दिखाई दी, और पुनः पट्टी बांधने पर शिव की छवि प्रकट हुई। इस दिव्य अनुभव से उनका अंतःज्ञान जागृत हुआ और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भगवान शिव और भगवान विष्णु की शक्तियां एक-दूसरे में समाहित हैं।
इसी आध्यात्मिक अनुभूति से प्रेरित होकर उन्होंने स्तुति गीत की रचना की और ईश्वर भक्ति में पूर्णतः लीन हो गए। उनकी अद्वितीय भक्ति और साधना से प्रभावित होकर उन्हें “संत शिरोमणि” की उपाधि प्राप्त हुई। बताया गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी भी उनकी ईश्वरी भक्ति से अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने नरहरी दास को अपना गुरु स्वीकार किया।
कार्यक्रम में प्रदीप प्रसाद, रामकुमार प्रसाद, बसंती देवी, कुमारी आस्था, कौटिल्य कुमार, स्वराज कुमार, भरत प्रसाद, केशव कुमार एवं गौतम कुमार सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे
