Friday, October 9, 2026
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आंखों में रोशनी नहीं थी, लेकिन इल्म की ऐसी शमा जलाई कि आने वाली पीढ़ियां भी होंगी रोशन: शकील अहमद ने क़ारी शब्बीर अहमद क़ासमी को दी ख़िराज-ए-अक़ीदत

मदरसा इस्लामिया, शकरपुर की तरक्की में क़ारी साहब का रहा अहम योगदान, इंतकाल के बाद भड़वारा पहुंचकर परिजनों से मिले पूर्व केंद्रीय मंत्री

मधुबनी/दरभंगा। बिहार के पूर्व केंद्रीय मंत्री और  वरिष्ठ नेता डॉक्टर शकील अहमद ने दरभंगा जिले के भड़वारा निवासी मशहूर आलिम-ए-दीन हाफ़िज़ क़ारी शब्बीर अहमद क़ासमी के इंतकाल पर गहरे दुख का इज़हार करते हुए उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है। क़ारी साहब का बीते 2 अक्टूबर को लंबी बीमारी के बाद पटना के एक अस्पताल में इंतकाल हो गया था। उनके निधन से धार्मिक और शैक्षणिक जगत में शोक की लहर है।

शकील अहमद ने बताया कि बीमारी के दौरान वह दो बार पटना के मेदांता अस्पताल जाकर क़ारी साहब की अयादत कर चुके थे। हालांकि, उनके इंतकाल के समय वह दिल्ली में  थे, जिस कारण जनाजे में शामिल नहीं हो सके। 6 अक्टूबर को बिहार लौटने के बाद 7 अक्टूबर को वह भड़वारा पहुंचे और मरहूम क़ारी साहब के परिजनों तथा करीबी लोगों से मुलाकात कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। इस दौरान क़ारी साहब के बड़े बेटे मौलाना दबीर अहमद समेत परिवार के अन्य सदस्य और बड़ी संख्या में उनके चाहने वाले मौजूद थे।

आंखों की रोशनी नहीं थी, लेकिन शिक्षा की रोशनी से रोशन किया समाज
क़ारी शब्बीर अहमद क़ासमी की जिंदगी संघर्ष, समर्पण और इल्म से मोहब्बत की एक मिसाल रही। अल्लाह ने उन्हें जन्म से ही आंखों की रोशनी नहीं दी थी, लेकिन उन्होंने इस कमी को अपनी कामयाबी के रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया। उन्होंने खुद शिक्षा हासिल की और अपना जीवन दूसरों तक ज्ञान की रोशनी पहुंचाने के लिए समर्पित कर दिया।

शकील अहमद ने अपने श्रद्धांजलि संदेश में कहा कि क़ारी साहब ने शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दिया, उसका लाभ केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली कई पीढ़ियां भी उससे लाभान्वित होती रहेंगी। उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि मजबूत इरादे, मेहनत और समर्पण से बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।

मदरसा इस्लामिया, शकरपुर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया
दरभंगा जिले के भड़वारा स्थित मदरसा इस्लामिया, शकरपुर की स्थापना इस्लामी विद्वान मरहूम क़ाज़ी मुजाहिदुल इस्लाम क़ासमी की सरपरस्ती में हुई थी। स्थापना के तीन-चार वर्षों के भीतर ही मदरसे की पूरी जिम्मेदारी क़ारी शब्बीर अहमद क़ासमी को सौंप दी गई।
इसके बाद क़ारी साहब ने स्थानीय लोगों के सहयोग से मदरसे के विकास और विस्तार के लिए लगातार मेहनत की। उनकी लगन और नेतृत्व में मदरसे ने उल्लेखनीय तरक्की की। आज इस संस्थान में न केवल स्थानीय, बल्कि दूर-दराज के इलाकों से भी बड़ी संख्या में छात्र शिक्षा हासिल करने आते हैं।

मदरसे का विशाल भवन और उसका शैक्षणिक विस्तार क़ारी साहब की वर्षों की मेहनत और समर्पण की कहानी बयां करता है। शकील अहमद ने उम्मीद जताई कि मदरसे की नई जिम्मेदारी संभालने वाले लोग भी उसी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ संस्थान को आगे बढ़ाएंगे, जिसकी मिसाल क़ारी शब्बीर अहमद क़ासमी ने अपने जीवन में पेश की।

इल्म और धार्मिक शिक्षा के लिए हमेशा याद किए जाएंगे क़ारी साहब
अपने संदेश में शकील अहमद ने हाफ़िज़ और क़ारी की धार्मिक शिक्षा में अहमियत का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि हाफ़िज़ उस व्यक्ति को कहा जाता है, जिसने पवित्र कुरआन शरीफ को कंठस्थ किया हो, जबकि क़ारी वह होता है, जो कुरआन शरीफ का सही उच्चारण और तजवीद के नियमों के अनुसार पाठ करता है।

क़ारी शब्बीर अहमद क़ासमी केवल एक धार्मिक विद्वान नहीं थे, बल्कि शिक्षा को समाज तक पहुंचाने वाले एक समर्पित व्यक्तित्व भी थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ज्ञान, धार्मिक शिक्षा और समाज की सेवा में लगा दी। उनके द्वारा स्थापित शैक्षणिक परंपरा और मदरसे के विकास में निभाई गई भूमिका लंबे समय तक याद की जाएगी।
क़ारी साहब से मेरा व्यक्तिगत लगाव था: शकील अहमद
शकील अहमद ने कहा कि उन्हें क़ारी साहब के प्रति गहरी श्रद्धा और सम्मान था। क़ारी साहब भी उन्हें बहुत अजीज रखते थे। उन्होंने इसे अपनी खुशनसीबी और क़ारी साहब की मेहरबानी बताया।

अपने श्रद्धांजलि संदेश के अंत में उन्होंने अल्लाह से मरहूम की मगफिरत की दुआ की और उनके परिवार, करीबियों तथा चाहने वालों को इस दुख को सहन करने की ताकत देने की अपील की।

उन्होंने भावुक शब्दों में कहा, “अल्लाह उनकी मगफिरत फरमाए और उनके परिवार के साथ-साथ उनके लाखों चाहने वालों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताकत अता करे। आमीन।”

उन्होंने मरहूम को श्रद्धांजलि देते हुए यह पंक्ति भी लिखी—
“आसमां तेरी लहद पर शबनम अफ़शानी करे।”

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