मधुबनी। “आसमां उनकी लहद पर शबनम अफशानी करे…” इन भावुक शब्दों के साथ मदरसा इत्तेहादुल मुस्लिमीन, मधुबनी के प्रिंसिपल मौलाना मोहम्मद अरशद दिलकश नदवी ने प्रख्यात इस्लामी विद्वान, अरबी भाषा एवं साहित्य के महान जानकार हजरत मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मौलाना का इंतकाल पूरी मिल्लत-ए-इस्लामिया, खानदान-ए-नदवतुल उलेमा और शैक्षणिक जगत के लिए ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
मौलाना अरशद दिलकश नदवी ने अपने शोक संदेश में कहा कि हजरत मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी ने अपनी पूरी जिंदगी दीन की सेवा, इल्मी और अदबी कार्यों तथा नई पीढ़ी की शिक्षा और तरबियत के लिए समर्पित कर दी थी। अरबी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। अपने लेखन और मार्गदर्शन से उन्होंने देशभर के मदरसों और शैक्षणिक संस्थानों को लाभ पहुंचाया।
इल्मी दुनिया की बुलंद शख्सियत थे मौलाना
मौलाना अरशद दिलकश नदवी ने कहा कि हजरत मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी इस्लामी जगत की जानी-मानी शख्सियत थे। वह प्रसिद्ध इस्लामी पत्रिका ‘अल-बअसुल इस्लामी’ के संपादक, दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ के मोहतमिम और इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उनका निधन केवल एक व्यक्ति का बिछड़ना नहीं, बल्कि इल्म, अदब, तालीम और दीन की सेवा के एक बड़े अध्याय का अंत है।
डांट में भी छिपी होती थी मोहब्बत, छोटे लोगों को आगे बढ़ाना थी पहचानl
अपने पुराने संबंधों को याद करते हुए मौलाना अरशद दिलकश नदवी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हजरत मौलाना की शख्सियत में छोटों पर स्नेह, प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने की अद्भुत क्षमता थी। वह जिस व्यक्ति पर भरोसा करते, उसके लिए पूरी ईमानदारी से सहयोग करते और समय-समय पर उसकी खबर भी लेते रहते थे।
उन्होंने कहा कि मौलाना की डांट में भी मोहब्बत, खैरख्वाही और सुधार की भावना छिपी रहती थी। उनकी फटकार भी लोगों के जीवन को सही दिशा देने और तरक्की की राह पर आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाती थी। आज के दौर में ऐसे गुणों वाली शख्सियत का बिछड़ जाना बेहद दुखद है।
जामिया उम्मुल खैर और मरवा एजुकेशन फाउंडेशन को मिला था खास मार्गदर्शन
मौलाना अरशद दिलकश नदवी ने बताया कि उन्हें कई वर्षों तक हजरत मौलाना के करीब रहने और उनसे सीखने का अवसर मिला। उन्होंने अपने ऊपर, अपने सम्मानित सहयोगी मनाज़िर-ए-इस्लाम तथा जामिया उम्मुल खैर निस्वां, लखनऊ पर मौलाना के एहसानों को याद करते हुए कहा कि संस्थान उनके योगदान को कभी नहीं भुला सकता।
उन्होंने कहा कि हजरत मौलाना की दूरदर्शिता, दुआओं और विशेष मार्गदर्शन से जामिया उम्मुल खैर निस्वां को अपनी पहचान बनाने में मदद मिली। इसी तरह मरवा एजुकेशन फाउंडेशन आज शिक्षा, समाजसेवा और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में जो कार्य कर रहा है, उसमें भी मौलाना की विशेष तवज्जो और दुआओं का अहम योगदान रहा है।
‘आंखें नम हैं, दिल गमगीन है, शब्द साथ नहीं दे रहे’
मौलाना अरशद दिलकश नदवी ने कहा कि हजरत मौलाना की खूबियों, उनके इल्मी योगदान और उनके साथ बिताए गए पलों को कुछ शब्दों में समेटना संभव नहीं है। इस समय आंखें नम हैं, दिल गमगीन है और उनसे जुड़ी यादें बार-बार सामने आ रही हैं।
उन्होंने अल्लाह रब्बुल इज्जत से दुआ की कि वह तमाम लोगों को हजरत मौलाना के इल्मी और अदबी खजाने की कद्र करने, उनकी शिक्षाओं पर अमल करने और उनके दिखाए रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए।
अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला मौलाना की तमाम दीनी और इल्मी सेवाओं को स्वीकार करे, उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम अता फरमाए और अपने खास बंदों में शामिल करे।
हजरत मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी का निधन एक ऐसी कमी छोड़ गया है, जिसे भरना आसान नहीं। उनकी इल्मी विरासत, अदबी सेवाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका मार्गदर्शन लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।
