Saturday, October 3, 2026
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एक शख्स नहीं गया, एक पूरा दौर चला गया… मौलाना कारी शब्बीर अहमद के इंतकाल पर भावुक कर देने वाला संस्मरण

एक शख्स नहीं गया, एक पूरा दौर चला गया…

मौलाना कारी शब्बीर अहमद के इंतकाल पर भावपूर्ण संस्मरण

(मुहम्मद अनस इबाद सिद्दीकी)

दुनिया एक मुसाफिरखाना है। यहां आने वाला कोई भी शख्स हमेशा रहने के लिए नहीं आता। काफिले आते हैं, कुछ देर ठहरते हैं और फिर खामोशी से आगे बढ़ जाते हैं। रोज किसी घर में जन्म की खुशी होती है और रोज किसी घर से जनाजा उठता है। यही जिंदगी है, यही वक्त का फेर है और यही इस दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई है।

लेकिन इस फानी दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी आते हैं, जिनका जाना महज एक व्यक्ति का जाना नहीं होता। वे रुख्सत होते हैं तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई पूरी परंपरा विदा हो गई हो, किसी तहजीबी मिजाज की आवाज खामोश हो गई हो, किसी इल्मी माहौल की एक रोशन कड़ी टूट गई हो और किसी दौर का एक अहम अध्याय बंद हो गया हो।

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ का इंतकाल भी इसी तरह का एक बड़ा सदमा है।

वह हमसे जुदा हुए तो सिर्फ एक बुजुर्ग आलिम, एक नाजिम, एक अदीब, एक खतीब और एक मुर्ब्बी हमसे जुदा नहीं हुआ, बल्कि मदरसा इस्लामिया शकरपुर की लगभग चार दशकों पर फैली एक पूरी कहानी अपने अंजाम तक पहुंच गई।

आज दिल बार-बार यही कहता है—

एक शख्स नहीं गया, एक पूरा दौर रुख्सत हो गया।

ऐसी शख्सियत, जिसकी याद वक्त के साथ और गहरी होती जाएगी

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ उन लोगों में से थे, जिनकी कद्र उनकी मौजूदगी में भी थी, लेकिन उनकी जुदाई के बाद उनकी शख्सियत के अलग-अलग पहलू और ज्यादा उजागर होते चले जाते हैं।

उनकी संजीदगी, शाइस्तगी, बुर्दबारी, सूझ-बूझ, इंतजामी सलाहियत, अदबी रुचि, बातचीत की मिठास और छात्रों के साथ उनका शफकत भरा रवैया—ये सभी ऐसी यादें हैं जो वक्त के साथ धुंधली होने के बजाय और गहरी होती जाएंगी।

उनके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान रहती थी। चलने में वकार, बैठने में संजीदगी, बातचीत में शाइस्तगी और मामलों में सच्चाई साफ दिखाई देती थी। उनसे मिलने वाला व्यक्ति महसूस करता था कि वह ऐसे इंसान के सामने बैठा है, जिसने जिंदगी को सिर्फ गुजारा नहीं, बल्कि उसे एक मकसद के लिए समर्पित किया।

करीब 40 वर्षों की नाजिमत—एक संस्था के निर्माण की कहानी

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ ने मदरसा इस्लामिया शकरपुर, भरवाड़ा, दरभंगा, बिहार में लगभग 40 वर्षों तक नाजिम के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई।

चालीस वर्ष!

यह सिर्फ एक अवधि नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी होती है।

इतने लंबे समय तक किसी संस्था से जुड़े रहना, उसके उतार-चढ़ाव देखना, उसकी परेशानियों को सहना, उसके निर्माण और विकास के लिए लगातार प्रयास करना और हर परिस्थिति में संस्था के हित को प्राथमिकता देना किसी सामान्य जुड़ाव का नाम नहीं है।

यह रिश्ता पद से आगे बढ़कर मुहब्बत, ईमानदारी, वफादारी और जिम्मेदारी का रिश्ता बन जाता है।

आपने मदरसा इस्लामिया शकरपुर को केवल एक मदरसा नहीं समझा। आपके लिए यह एक इल्मी अमानत थी—एक ऐसा ज्ञान केंद्र, जिसकी इमारतों से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका इल्मी माहौल, उसके छात्र, शिक्षक और उसकी दीनी व तरबियती परंपरा थी।

आपकी नाजिमत के दौर में मदरसे ने विकास के कई चरण तय किए। अलग-अलग क्षेत्रों से छात्र यहां आए, ज्ञान की प्यास बुझाई और अपने-अपने इलाकों में लौटकर इस संस्था की इल्मी पहचान को और व्यापक बनाया।

किसी संस्था की असली कामयाबी उसकी इमारतों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसके माध्यम से तैयार होने वाली पीढ़ियों से तय होती है।

मेरी छात्र जिंदगी के सुनहरे दिन

मेरे लिए हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ की याद महज किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की याद नहीं है।

उनसे मेरा रिश्ता मेरी छात्र जिंदगी के उन सुनहरे दिनों से जुड़ा है, जिन्हें इंसान पूरी जिंदगी नहीं भूल सकता।

हमने मदरसा इस्लामिया शकरपुर में अपनी छात्र जिंदगी का एक अनमोल दौर हजरत नाजिमؒ की सरपरस्ती में गुजारा। आज जब अतीत की ओर नजर उठती है तो मदरसे की इमारत, उसका माहौल, शिक्षकों की बैठकें, छात्रों की व्यस्तताएं और इन सबके बीच हजरत नाजिमؒ की शख्सियत एक रोशन तस्वीर की तरह सामने आ जाती है।

उनकी शफकत भरी तवज्जो हम छात्रों के लिए सचमुच टॉनिक का काम करती थी।

छात्र जीवन में कुछ बुजुर्ग ऐसे होते हैं, जिनकी एक नजर, एक बात, एक मुस्कान और हौसला बढ़ाने वाला एक शब्द भी जिंदगी भर का पूंजी बन जाता है।

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ भी उन्हीं बुजुर्गों में से थे।

उनकी मौजूदगी में हमें सिर्फ एक नाजिम की सरपरस्ती हासिल नहीं थी, बल्कि एक बुजुर्ग की शफकत, एक मुर्ब्बी की तवज्जो और एक अनुभवी शख्सियत की रहनुमाई भी मिलती थी।

आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो छात्र जीवन के वे दिन भी जैसे अचानक बहुत दूर चले गए हैं।

आंखों की रोशनी सीमित थी, लेकिन बसीरत बेहद गहरी

अल्लाह तआला ने हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ को जाहिरी बीनाई से महरूम रखा था, लेकिन उन्हें ऐसी इल्मी और ईमानी बसीरत अता फरमाई थी, जिसके सामने जाहिरी नजर की कमी बेअर्थ महसूस होती थी।

वह संस्था के मामलों को जिस गहराई से समझते, लोगों के मिजाज को जिस तरह पहचानते और फैसलों में जिस संतुलन व दूरदर्शिता से काम लेते, वह उनकी असाधारण बसीरत की निशानी थी।

यह कहना गलत नहीं होगा—

आंखों की रोशनी सीमित थी, लेकिन निगाह-ए-बसीरत बहुत दूर तक देखती थी।

लगभग चार दशकों तक एक बड़े दीनी संस्थान की नाजिमत संभालना इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि उनके भीतर असाधारण प्रशासनिक क्षमता, धैर्य, सूझ-बूझ और दूरदर्शिता थी।

उनके लिए नाजिमत किसी कुर्सी या पद का नाम नहीं थी। वह इसे एक अमानत समझते थे और अमानत निभाना जानते थे।

नाजिम के भीतर छिपा एक अदीब

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ की शख्सियत का एक बेहद दिलकश पहलू उनका अदबी मिजाज था।

वह केवल प्रशासनिक मामलों के माहिर नहीं थे, बल्कि साहित्य से उनका गहरा रिश्ता था। उनकी तबीयत में शाइस्तगी, भाषा में सरलता और अभिव्यक्ति में एक खास नजाकत थी।

वह शायर भी थे और ‘हाफिज’ उनका तखल्लुस था। नात, नज्म और गजल—विभिन्न विधाओं में उन्होंने अपनी शायरी का हुनर आजमाया।

देवबंद में उनकी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण दौर गुजरा। वहां के इल्मी और अदबी माहौल तथा साहित्यिक रुचि रखने वाले लोगों की संगत ने उनकी इस प्रतिभा को और निखारा।

उनकी लेखनी में शब्दों की नुमाइश नहीं होती थी, बल्कि अर्थ की खूबसूरती होती थी।

उनकी भाषा में इल्मी गरिमा भी थी और अदबी मिठास भी। शब्द सरल होते थे, लेकिन उनके पीछे गहरी साहित्यिक समझ और इल्मी شعور महसूस होता था।

जब वह बोलते थे तो शब्दों में मिठास घुल जाती थी

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ की बातचीत सुनना भी अपने आप में एक अनुभव था।

वह बोलते तो ऐसा लगता था जैसे शब्द जुबान पर आते नहीं, बल्कि सलीके से उतरते जाते हैं।

उनके लहजे में मिठास, बयान में सरलता, बातचीत में सहजता और शब्दों में एक खास असर होता था।

उनकी महफिल में बैठने वाला व्यक्ति महसूस करता था कि बातचीत सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं, बल्कि एक अदबी आनंद भी है।

वह किसी विषय पर बात करते तो इल्मी वजन भी कायम रहता और भाषा की खूबसूरती भी।

इसीलिए उनकी बातें सुनने वाले बहुत से लोग आज भी उनके बातचीत के अंदाज को याद करते हैं।

एक मुर्ब्बी, जिसकी असली विरासत उसके शागिर्द हैं

इमारतें पुरानी हो जाती हैं, किताबों के नए संस्करण आ जाते हैं, पद बदल जाते हैं और समय अपने तौर-तरीके बदल देता है। लेकिन एक मुर्ब्बी की असली विरासत उसके शागिर्द होते हैं।

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ ने जिस पीढ़ी की तरबियत की, उसके प्रभाव उनकी जिंदगी के बाद भी कायम रहेंगे।

उन्होंने छात्रों को सिर्फ एक शिक्षण संस्था का हिस्सा नहीं समझा, बल्कि उनकी इल्मी और नैतिक तरबियत को भी अपनी जिम्मेदारी माना।

उनकी शफकत, निगरानी और रहनुमाई से गुजरने वाले छात्र आज जहां कहीं भी हैं, उनकी शख्सियत में हजरत नाजिमؒ की किसी न किसी तरबियती तवज्जो की झलक जरूर मिलती होगी।

इल्मी और अदबी विरासत का एक रोशन चिराग

आज हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ हमारे बीच नहीं हैं। वह भी उन मुसाफिराने आखिरत में शामिल हो गए, जिनकी मंजिल अब हमारी निगाहों से ओझल है।

लेकिन अल्लाह तआला ने उनके घर में इल्म और अदब का चिराग रोशन रखा है।

उनके फरजंद-ए-अर्जुमंद, मेरे भाई मौलाना दबीर अहमद कासमी को भी अल्लाह तआला ने इल्म और अदब का सलीकेदार जौक अता फरमाया है। वह अपने वालिद की तरह बेहद जहीन और सही राय रखने वाले हैं।

उम्मीद है कि वह अपने वालिद-ए-मुहतरम की इल्मी, अदबी, तहजीबी और इंतजामी विरासत के अमीन बनेंगे और अपनी इल्मी व अदबी जिंदगी के माध्यम से उनकी याद को जिंदा रखेंगे।

यही नेक औलाद और यही इल्मी विरासत किसी अहले-इल्म की जिंदगी का सबसे खूबसूरत सिलसिला होती है।

आज शकरपुर की फिजा कुछ उदास है

आज मदरसा इस्लामिया शकरपुर की फिजा निश्चित रूप से उदास होगी।

वह जगह जहां चार दशकों तक उनकी आवाज सुनाई देती रही, जहां उनके कदमों की आहट से संस्था परिचित रही, जहां छात्रों ने उनकी सरपरस्ती में अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण वर्ष गुजारे—वहां आज उनकी गैरमौजूदगी एक महसूस होने वाला खालीपन है।

कुछ लोग अपनी मौजूदगी से जगहों को आबाद करते हैं और जब चले जाते हैं तो जगहें देखने में वही रहती हैं, लेकिन उनकी रूह में एक कमी पैदा हो जाती है।

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ भी मदरसा इस्लामिया शकरपुर के इतिहास का ऐसा ही एक रोशन अध्याय थे।

एक शख्स नहीं, एक पूरा दौर रुख्सत हुआ

आज उनकी रुख्सती पर दिल यही कहने को मजबूर है—

एक शख्स नहीं गया, एक पूरा दौर रुख्सत हो गया।

एक ऐसा दौर, जिसमें संस्था के प्रति वफादारी थी, पद को अमानत समझने का मिजाज था, छात्रों के लिए शफकत थी, इल्म के लिए सम्मान था, अदब के लिए रुचि थी और बातचीत में शाइस्तगी थी।

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी याद मदरसा इस्लामिया शकरपुर की दीवारों से, उनके शागिर्दों के दिलों से, उनके साथियों की यादों से और उनकी इल्मी व अदबी विरासत से जुड़ी रहेगी।

इंसान चला जाता है, लेकिन उसका किरदार बाकी रहता है।

सांस रुक जाती है, लेकिन नेक अमल की खुशबू बाकी रहती है।

आवाज खामोश हो जाती है, लेकिन कहे गए अच्छे शब्द दिलों में गूंजते रहते हैं।

और जिंदगी खत्म हो जाती है, लेकिन एक अच्छी जिंदगी की कहानी खत्म नहीं होती।

हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ भी अपनी लंबी इल्मी, दीनी, शैक्षिक, अदबी और प्रशासनिक सेवाओं के कारण इसी जीवंत कहानी का हिस्सा बने रहेंगे।

अल्लाह तआला हजरत मौलाना कारी शब्बीर अहमद साहबؒ की तमाम इल्मी, दीनी, शैक्षिक, अदबी और प्रशासनिक सेवाओं को शर्फ-ए-कबूल अता फरमाए।

उनकी गलतियों और कमियों को माफ फरमाए, उनकी कब्र को नूर से भर दे, उसे कुशादा फरमाए, उनके दर्जात बुलंद फरमाए और जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम अता फरमाए।

अल्लाह तआला उनके परिवार, संबंधियों, शागिर्दों, साथियों और तमाम चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।

मौत उसकी है करे जिसका जमाना अफसोस,
यूँ तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए।

 

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