कोर्ट ने कहा- “संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा अभियोजन”, साक्ष्यों में भारी गड़बड़ी उजागर
मधुबनी:
एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक चर्चित मामले में मधुबनी व्यवहार न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन अभियुक्तों को ससम्मान बाइज्जत बरी कर दिया। जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-IV की अदालत ने हरलाखी थाना कांड संख्या 31/2025 (G.R. No. 11/2025) में सुनवाई पूरी करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को विश्वसनीय तरीके से साबित करने में असफल रहा।
इस मामले में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रकाश मणि झा ने अदालत में ऐसी सशक्त कानूनी दलीलें पेश कीं, जिसने अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
सीमा पर गिरफ्तारी से शुरू हुआ था मामला
अभियोजन के अनुसार 11 फरवरी 2025 को एसएसबी की गश्ती टीम ने भारत-नेपाल सीमा स्थित पिलर संख्या 284/35 के समीप नेपाल के धनुषा निवासी सुमन कुमार राय को पकड़ा था। दावा किया गया कि उसके पास से 15 बोतल कोडीन युक्त कफ सिरप और अन्य प्रतिबंधित दवाएं बरामद हुई थीं।
पूछताछ में सुमन कुमार राय ने कथित रूप से बताया कि उसने यह दवाएं पिपरौन स्थित लक्ष्मण गुप्ता की दुकान “गुप्ता हार्डवेयर” से खरीदी थीं, जिसमें राहुल सिंह की भी भूमिका बताई गई। इसके बाद एसएसबी और पुलिस की संयुक्त टीम ने छापेमारी कर भारी मात्रा में दवाएं जब्त करने का दावा किया था।
अधिवक्ता प्रकाश मणि झा की बहस से खुली जांच की परतें
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रकाश मणि झा ने कोर्ट के समक्ष कई गंभीर कानूनी और प्रक्रियागत खामियों को उजागर किया।
1. कोर्ट में पेश माल और जब्ती सूची में बड़ा अंतर
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि जब्ती सूची में 110 कफ सिरप की बोतलें दर्ज थीं, लेकिन कोर्ट में मात्र 86 बोतलें पेश की गईं।
इसी प्रकार 180 इंजेक्शन की जगह 186 इंजेक्शन कोर्ट में पेश किए गए। कई टैबलेट भी कम पाए गए।
अधिवक्ता झा ने इसे साक्ष्यों के साथ गंभीर छेड़छाड़ करार दिया।
2. घटनास्थल को लेकर विरोधाभास
एफआईआर में बरामदगी “गुप्ता हार्डवेयर” दुकान से दिखाई गई थी, जबकि जांच अधिकारी ने अदालत में स्वीकार किया कि बरामदगी दुकान से नहीं बल्कि खुले बगीचे (बाड़ी) से हुई थी।
3. मौके पर नहीं बने जरूरी दस्तावेज
गवाहों ने अदालत में स्वीकार किया कि जब्ती सूची और अन्य दस्तावेज घटनास्थल पर तैयार नहीं किए गए थे।
बचाव पक्ष के अनुसार सभी कागजात बाद में एसएसबी कैंप और साइबर कैफे में बैठकर टाइप किए गए।
4. BNSS कानून की अनदेखी
अधिवक्ता झा ने अदालत को बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 के तहत तलाशी और जब्ती की वीडियोग्राफी अनिवार्य है, लेकिन पूरे मामले में इसका पालन नहीं किया गया।
5. FSL रिपोर्ट तक पेश नहीं कर सका अभियोजन
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ऐसी कोई वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट या FSL रिपोर्ट पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि जब्त कफ सिरप में कोडीन की मात्रा एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रतिबंधित सीमा से अधिक थी।
अदालत ने दिया संदेह का लाभ
माननीय न्यायालय ने अपने फैसले में माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
इसके बाद अदालत ने सुमन कुमार राय, राहुल सिंह और लक्ष्मण गुप्ता को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए ससम्मान बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया।
अधिवक्ता प्रकाश मणि झा की लगातार बढ़ रही कानूनी साख
कानूनी हलकों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि अधिवक्ता प्रकाश मणि झा लगातार एनडीपीएस जैसे जटिल मामलों में अपने मुवक्किलों को राहत दिलाने में सफल हो रहे हैं।
इससे पहले भी उन्होंने कई चर्चित मामलों में अभियोजन पक्ष की कमजोरियों को अदालत के सामने प्रभावी ढंग से रखा है l
लदनिया थाना कांड संख्या 238/2023 में नेपाल निवासी संतोष कुमार यादव को प्रतिबंधित दवाओं के मामले में बरी कराया।
पंडौल थाना कांड संख्या 58/2023 में 1 किलो 5 ग्राम ब्राउन शुगर बरामदगी मामले में मुजफ्फर हुसैन और उमर फारूक को ससम्मान मुक्त कराया।
14 मई 2026 को जयनगर थाना कांड संख्या 152/2023 में 216 ग्राम ब्राउन शुगर, कफ सिरप और अवैध हथियार बरामदगी के मामले में उमर फारूक समेत सभी छह आरोपियों को बाइज्जत बरी कराने में सफलता हासिल की।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रक्रियागत
खामियों, वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी और जांच में हुई त्रुटियों को अदालत के सामने प्रभावशाली ढंग से रखने की अधिवक्ता प्रकाश मणि झा की क्षमता ही उनकी लगातार सफलताओं का मुख्य कारण बन रही है।
